…देख ज़िन्दगी दर्द में भी मैं हंसा जा रहा हूं…

इतने दर्द के बाद भी मुस्कुरा रहा हूं
देख ज़िन्दगी, तेरी तकलीफों को कैसे हरा रहा हूं…
तकलीफों को हराकर जीना तो आदत सी है मेरी,
पर कई सवालों में मै घिरा जा रहा हूं
देख ज़िन्दगी दर्द में भी मैं हंसा जा रहा हूं…
दर दर भटकता अब रुका जा रहा हूं
हर मोड़ को ही अपना मै कहा जा रहा हूं
देख ज़िन्दगी दर्द में भी मैं हंसा जा रहा हूं…
आंखों में छिपे हैं ख्वाब कई
ख्वाब नहीं, हैं ये राज़ कई
ख्वाबों के शिखर से घिरा जा रहा हूं…
देख ज़िन्दगी दर्द में भी मैं हंसा जा रहा हूं…
यूं तो कुछ अधूरी सी हैं खुशियां मेरी
मुकम्मल करने उन्हें मैं चला जा रहा हूं
देख ज़िन्दगी दर्द में भी मैं हंसा जा रहा हूं…

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